व्याकरण किसे कहते हैं और भाषा से क्या तात्पर्य है

व्याकरण किसे कहते हैं और भाषा से क्या तात्पर्य है

व्याकरण-जिस शास्त्र में शब्दों के शुद्ध रूप और प्रयोग के नियमों का निरूपण होता है, उसे व्याकरण कहते हैं। व्याकरण (वि + आ + करण) शब्द का अर्थ ‘भली-भांति समझना’ है।भाषा वह साधन है जिसके द्वारा मनुष्य अपने विचार दूसरों पर भली-भांति प्रकट कर सकता है। और दूसरों के विचार आप स्पष्टतया समझ सकता है।

भाषा का सर्वाधिक महत्त्व है। यह विचार व्यक्त करने का सर्वोत्तम साधन है। भाषा के माध्यम से ही अन्य विषयों का अध्ययन संभव होता है। धर्मशास्त्र, राजनीति, ज्योतिष विद्या, विज्ञान, दर्शन-शास्त्र आदि विषयों का अध्ययन भाषा के ज्ञान के बिना नहीं हो सकता।. भाषा का दो प्रकार से प्रयोग होता है.
1.बोल कर
2.लिख कर

हिंदी भारत की राष्ट्र भाषा है। यह उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश और दिल्ली की मुख्य भाषा है। यह देवनागरी लिपि में लिखी जाती है। इसकी लोकप्रियता दिन-प्रतिदिन बढ़ती जाती है.हिंदी की लिपि देवनागरी है। इस लिपि में कुछ विशेष चिह्नों का प्रयोग होता है। इन चिह्नों के समूह को वर्णमाला कहते हैं.

वर्णमाला – किसी भी भाषा में प्रयुक्त होने वाले वर्षों के समूह को वर्णमाला कहते हैं। हिंदी की वर्णमाला इस प्रकार है.

वर्गों के दो भेद हैं-(क) स्वर, (ख) व्यंजन

स्वर

स्वर उन वर्गों को कहते हैं जिनका उच्चारण स्वतंत्रतापूर्वक से होता है और जो व्यंजनों के उच्चारण में सहायक होते हैं। हिंदी में स्वर ग्यारह हैं

स्वरों के भेद–  उच्चारण के अनुसार स्वरों के तीन भेद हैं
ह्रस्व – जिन स्वरों के उच्चारण में एक मात्रा का समय लगता है, उन्हें ह्रस्व स्वर अथवा मूल स्वर कहते हैं-अ, इ, उ, ऋ।

दीर्घ – जिन स्वरों के उच्चारण में ह्रस्व स्वर से दुगुना समय लगता है, उन्हें दीर्घ स्वर कहते हैं। इन्हें संधि स्वर भी कहते हैं। आ, ई, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ। दो स्वरों के योग के कारण ही इन्हें संधि स्वर की संज्ञा दी गई है।

आ = अ + अ
ई = इ + इ
ऊ = उ + उ
ए = अ + इ
ऐ = अ + ए,
ओ = अ + उ
औ = अ + ओ

प्लुत – जिन स्वरों के उच्चारण में ह्रस्व से तिगुना समय लगता है, उन्हें प्लुत् स्वर कहते हैं। प्लुत् प्रकट करने के लिए स्वर के पीछे ३ का चिह्न लगाते हैं ; जैसे—कृष्ण ३, राधा ३। यज्ञ करते समय लोग ओ३म् का उच्चारण ओ३म की तरह करते हैं।

व्यंजन

व्यंजन वे वर्ण हैं, जो स्वर की सहायता के बिना नहीं बोले जा सकते हैं। ये 33 हैं

क   ख ग   घ ङ
च   छ ज   झ ञ
ट    ठ ड   ढ ण
त    थ द   ध न
प    फ ब   भ म
य    र ल   व
श    ष स  ह

व्यंजनों के भेद-व्यंजनों के तीन भेद हैं

स्पर्श – जिन व्यंजनों का उच्चारण जिहवा द्वारा मुख के अनेक भागों पर लगने से होता है, उन्हें स्पर्श व्यंजन कहते हैं।

अंतःस्थ-जिन व्यंजनों के उच्चारण में जिह्वा उच्चारण स्थान के अत्यंत निकट पहुँच जाती है, उन्हें अंत:स्थ व्यंजन कहते हैं; जैसे—य, र, ल, व। स्वरों और व्यंजनों के बीच स्थित होने के कारण इन्हें अंत:स्थ व्यंजन कहते हैं। इन्हें अर्ध-स्वर और अर्ध-व्यंजन भी कहते हैं।

ऊष्म-जिन वर्गों के उच्चारण में श्वास गर्म हो जाती है तथा बोलते समय ‘सीटी’ की-सी ध्वनि निकलती है, उन्हें उष्म व्यंजन कहते हैं; जैसे-श, ष, स, ह।

उच्चारण-स्थान तथा उच्चारण

अवयव-जिन अवयवों से उच्चारण किया जाता है, उन्हें उच्चारणस्थान या उच्चारण अवयव कहते हैं.

वर्ण स्थान नाम
अ, आ, कवर्ग (क, ख, ग, घ, ङ), ह, विसर्ग (:)

इ, ई, चवर्ग (च, छ, ज, झ, ञ), य, श

ऋ, टवर्ग (ट, ठ, ड, ढ, ण), र, ष

तवर्ग (त, थ, द, ध, न), ल, स

उ, ऊ पवर्ग (प, फ, ब, भ, म)

ङ, ञ, ण, न, म, अनुस्वार

ए, ऐ

ओ, औ

कंठ

तालु

मूर्धा

दंत

ओष्ठ

नासिका

कंठ-तालु

कंठ-ओष्ठ

दंत-ओष्ठ

कठ्य

तालव्य

मूर्धन्य

दंत्य

ओष्ठ्य

नासिक्य

कंठ-तालव्य

कंठोष्ठ्य

दंतोष्ठ्य

हिंदी व्यंजनों के उच्चारण स्थान या उच्चारण अवयव

1. ओष्ठ्य या दूयोष्ठ्य – जिनका उच्चारण दोनों ओष्ठों में होता है। प्, फ्, ब्, भ्, म् व्, ओष्ठ्य और दूयोष्ठ्य व्यंजन हैं।
2. दंतोष्ठ्य – जिनका उच्चारण ऊपर के दाँत और नीचे के ओष्ठ से हो। हिंदी में फ् तथा व् दंतोष्ठ्य व्यंजन हैं।
3. दंत्य – जिनका उच्चारण जीभ की नोक तथा ऊपर के दाँतों से होता है। हिंदी में त्, थ्, दु, थ् दंत्य व्यंजन हैं।
4. वत्यै – जिनका उच्चारण वत्र्त्य से होता है। हिंदी में न्, र, लु, स्, ज् वत्र्य्य व्यंजन हैं।
5. तालव्य या कठोर तालव्य – जिनका उच्चारण कठोर तालु से होता है। हिंदी में च, छ, ज, झू, ज्, य, श् तालव्य व्यंजन हैं।
6. मूर्धन्य – जिनका उच्चारण मूर्धा से होता है। संस्कृत में वर्ण तथा मूर्धन्य व्यंजन है। हिंदी में वर्ग को मूर्धन्य माना जाता है, किंतु वास्तविक रूप में ट, ठ, ड, ढ, ण् ढ़ का उच्चारण मूर्धा से न होकर कुछ लोगों द्वारा मूर्धा और कठोर तालु के संधि-स्थल से, कुछ लोगों द्वारा कठोर तालु तथा वर्ल्स के संधि-स्थल से होता है।
7. कोमल तालव्य – जिनका उच्चारण कोमल तालु से होता है। हिंदी में क, ख, ग, घ, ङ् जिह्वा व्यंजन कोमल तालव्य हैं।
8. जिह्वामूलीय या अजिह्वीय – जिन ध्वनियों का उच्चारण जीभ की जड़ तथा अजिह्वा की सहायता से होता है। हिंदी क् व्यंजन ऐसा ही है।
9. स्वरयंत्र मुखी – जिस ध्वनि का उच्चारण स्वरयंत्र मुख से हो। हिंदी की ध्वनि स्वरयंत्र मुखी है।

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